बाज़ार।।।

बाज़ार से निकलते हुए मैंने भी आज पूछा था उन बिखरीं चीज़ों का दाम,
बेच रहा था कोई गाती हुयी मैना,
थे कई फूल अनजाने से,
रखी थी सहेज के किसी ने वो पुरानी तस्वीर,
सो रुपये, पचास रुपए, ना बाबूजी बस और नहीं,
बाज़ार रंगीन था, बाज़ार ज़िंदा था, वक़्त बेफ़िक्र था,
मासूमियत झूलों से आसमान छू रही थी,
ज़मीन पर बैठा उम्र से बड़े कपड़े पहने एक लड़क था,
तालों से भरी कुछ टोकरियाँ, कुछ चाबियाँ भी थीं,
यह ताला देखो साहब सिर्फ़ दस का,
जंग लगे उस ताले को हाथ मैं पकड़ा दिया उसने,
ले जाओ साहब, कोई नहीं खोल पाएगा इसे,
सामने जाते हुए कोई जानी पहचानी सी महक थी,
मीठे बताशे, गरमा गरम समोसे,बुढ़िया के बाल थे,
ताले दिख नहीं रहे थे, चाबियाँ कुछ ख़ामोश थी,
पाँच रुपए दूँगा, एक रुपए ना ज़्यादा,
दुकानदार ने कुछ समोसे नीचे फेंक दिए थे,
कच्चे हैं साहब, दूसरा देता हूँ,
ताले लग गए थे हाथों में उसके, चाबियाँ ना जाने कहाँ थी,
ले जाओ साहब, 
छोटे ने आज कहा था,
भैया समोसे लेते आना,
बाज़ार से निकलते हुए मैंने भी आज पूछा था उन बिखरीं चीज़ों का दाम,
कुछ सपने थे, कुछ ख़ुशियाँ थी, 
सब कुछ बिकता है यहाँ,
सब कुछ और कुछ नहीं…।।।।।।।।