लकीरें…..

कुछ लिख के गया था मैं,
बारिश के मौसम में कभी,
शब्दों ने कुछ रूप लिया था,
कलम ने बहाई स्याही सही,
ना जाने क्यूँ कई लकीरें मीट के भी मिटती नहीं,
समय के साथ धूल में मिलती नहीं,

कुछ लिख के गया था मैं,
ऐसे ही किसी दिन उस काग़ज़ पे तेरे,
जो दिया था तूने मुकम्मल यह साजिश सही,
फिर शब्दों ने मेरे जब रचा था आशियाना मासूम,
मिलके तुमने बुना था कुनबा तभी,
थी रोशनी, थी कोई कमी नहीं,

कुछ लिख के गया था मैं,
उन दीवारों, उस अशियाने में कभी,
कुछ लकीरें मीट के भी मिटती नहीं,
छोड़ जाती हैं निशान कई ऐसे कभी,
हम तुम तो ज़रिया हैं,
एक कश्ती जिसका कोई किनारा नहीं,

चलो आज उठा कर एक पन्ना नया,
शुरुआत करते हैं ऐसी कोई,
जिसमें तुम तुम हो,
जिसमें मैं मैं हूँ,
जिसमें दिखते तुम या मैं भी नहीं,
मिटा दो वो लकीरें सभी,
बारिश आज तो होगी ही सही……