पैमाना

कुछ इस क़दर गये थे तुम,

आज भी उन सिलवटों को काग़ज़ पर उतारने कि कोशिश कर रहा हूँ,

ना जाने कैसा ख़ुमार था कशिश में तुम्हारी,

मैं आज भी अपना पैमाना ढूंढ रहा हूँ…….