आशिक़

आशिक़ों का कहाँ होता है कोई दिन,

मज़हब या होता ही कोई नाम,

आशिक़ों की तो है उम्र,

जब तक है यह समा,

ये ज़मीन ओ आसमाँ,

मरके भी जो क़ायम है,

ना मरके भी जो ज़िंदा है,

है खुदा भी जो,

है ग़ुलाम भी कभी,

गिरता भी जो है,

संभलता भी है कभी,

उजाड़ता जो बस्तियाँ भी है,

सुकून से सुलाता भी है,

है शायद तू भी,

या शायद हूँ में भी,

आशिक़ों का कहाँ होता है कोई दिन,

आशिक़ी ही होगी शायद,

जिससे हूँ में, हो तुम भी,

आशिक़ों के नाम हो हर सदी

हर सदी……