राज़ गेहरा….

हर उम्र में छुपा है,
कोई राज़ गेहरा,
शब्दों से कोई,
तो करता है इशारों से बेपरदा,
में निकलता हूँ बाज़ारों से जब भी,
कुछ गुनगुना सी देतीं हैं,
आवाज़ें अनसुनी,
कोई चर्चा,
कोई क़िस्सा,
समेट के रख लेता हूँ उन आवाज़ों को झोले में अपने,
ना जाने किस उम्र में शब्दों का लिबास ओढ़ कर,
ये आ जाएँ ज़ुबान पे मेरी,
या फ़िर ग़ुम हो जाएँ इन सिलवटों पे मेरी,
क्या नहीं छुपा मुझमें भी कोई राज़ गेहरा….?