गवारा नहीं….

क्या हुआ जो मुकम्मल ना हो सका वो इश्क़ मेरा,
पुरा था पर शायद ज़रूरी नहीं,
देख के चाँद रोज़ सजदा कर लेता हूँ,
क़ाबिल था पर शायद गवारा नहीं……