आख़िर कैसा है प्यार …?

वो प्यार प्यार नहीं,
तोड़ के जिसने ही,
झँझोर के भी,
आसमान में उड़ा के,
पटका ना हो ज़मीन पे कभी,

सुकून भी उतना ही हो उसमें,
जितनी बेचैनी ही,
पत्थर को खुदा जो बना देता भी है,
गुमशुदा कर देता वोही,

सौ उम्र भी जो दिखाता है,
हर रोज़ फ़ना करता वोही,
जान ले लेता है,
कर देता है अमर भी वोही,

हर किसी के नसीब में कहाँ,
लिखा है इश्क़ ऐसा कोई,
तुम-मैं तो ज़रिया हैं,
मुकम्मल इश्क़ किसी का,
शायद होगा इश्क़ ऐसा भी कोई…..