आशियाँ

कुछ खोके भी शायद कुछ पाया मैंने,
कुछ पा के शायद कुछ खोया भी,
अँधेरे में गुज़र रही थी ये हस्ती मेरी,
आपको देखा तो पाई रोशनी भी,
कहते हैं मुलाज़िम नहीं इश्क़ किसी का,
कई रियासतें हैं उजाड़ी इसी ने भी,
बस अब और गिला क्या होगा,
जब मिल चुका है इस नाचीज़ को आशियाँ तुझमें भी…..