तुम मत आना….

तुम मत आना,
की अँधेरों से झूझ रहा है ज़मीर उनका,
आशाओं का गला घोंट के,
की उनकी होती है सुबह हर पहर,
तुम मत आना,
की सहम जाता हूँ मैं भी,
अख़बार में जब दम तोड़ती है,
बच्ची किसी की,
शायद माँ, शायद पत्नी किसी की,
ग़ुस्सा भर जाता है इस बेजान से बदन में मेरे भी,
जब नहीं उड़ पाती तुम,
आसमान किसी के बाप का नहीं,
चाहूँगा तो मैं तुम्हें शायद किसी और से ज़्यादा,
जब अगर आओगी तुम घर में मेरे,
अपनी नन्ही उँगलियों से जब थाम लोगी मेरे सपने,
और जब पुकारोगी मेरा नाम,
उस मीठी सी आवाज़ में,
मैं दौड़ा चला आऊँगा,
नहीं रोक पाएँगी सरहदें भी मुझे,
पर तुम मत आना,
की शायद सुबह होगी कभी तो,
और देख सकेंगे ये ज़लील,
की तुम मिलती हो ख़ुशनसीबी से,
की इस शरीर से आगे सृष्टि है तुम्हारी,
मैं तब तक सुधारूँगा खुद को भी,
शायद कुछ आस पास के लोग भी,
तुम तब तक मत आना,
की रात अभी है काली…..