बस आज

तो क्या हुआ जो आसमाँ आज साफ़ नही,
हवाओं में कुछ गुमशुदा सा है,
कुछ भीगी भीगी सी आस है,
मद्धम सी चल रही नदियाँ हैं,

तो क्या हुआ नींद नहीं आ रही है,
करवटें बदल बदल के तुमने जो रातें काटी हैं,
ना रात गुज़र रही है,
सूरज जैसे कहीं छुपा सा है,

तो क्या हुआ जो रास्ते उलझे उलझे से,
शक के धुएँ में मंज़िल नज़र नहीं आती है,
मैं किस और जाऊँ,
क्या यही मेरी राह गुज़र है,

मैं सोचता सब हूँ,
सोचता शायद कुछ भी नहीं,
एक ख़याल ज़रूर आज आया है,
तो क्या हुआ जो नहीं मैं जो होना था,
जो हूँ शायद नहीं भी होता,
मगर यह ख़याल आज जाने दे,
की आज मैं मुझमें कुछ रहना चाहता हूँ,
की आज बस सोना चाहता हूँ…….

A regular man

I am a regular man,
Who feels the wind on his face,
The cold soft breeze,
Hot and thorny sometimes,
For I see through small viscera,
The fabric of time,
The minuscule, timid that intimidates me sometimes,
As I lay down to relax,
On my bed, my abode,
But I am a regular man,
That sleeps sometimes through the terrible storms,
And sometimes pick up a hammer to nail the wriggling seasoned doors on my facia,
Nothing much to hide,
Not much to show,
A plaid, straight old rhythm,
Somewhat like the Beethoven’s Für Elise,
Regular, easy….