बस आज

तो क्या हुआ जो आसमाँ आज साफ़ नही,
हवाओं में कुछ गुमशुदा सा है,
कुछ भीगी भीगी सी आस है,
मद्धम सी चल रही नदियाँ हैं,

तो क्या हुआ नींद नहीं आ रही है,
करवटें बदल बदल के तुमने जो रातें काटी हैं,
ना रात गुज़र रही है,
सूरज जैसे कहीं छुपा सा है,

तो क्या हुआ जो रास्ते उलझे उलझे से,
शक के धुएँ में मंज़िल नज़र नहीं आती है,
मैं किस और जाऊँ,
क्या यही मेरी राह गुज़र है,

मैं सोचता सब हूँ,
सोचता शायद कुछ भी नहीं,
एक ख़याल ज़रूर आज आया है,
तो क्या हुआ जो नहीं मैं जो होना था,
जो हूँ शायद नहीं भी होता,
मगर यह ख़याल आज जाने दे,
की आज मैं मुझमें कुछ रहना चाहता हूँ,
की आज बस सोना चाहता हूँ…….