फिर कभी

मैं तक़दीरों से लड़ता हूँ,
बंद कमरों में उलझता हूँ,
की जनता नही सर्द हवाएँ लाती क्या खबर हैं,
जब साँसे झिझक के सीने में उठती हैं,
और उँगलियों की कपन से मैं उठ जाता हूँ,
वक़्त है शायद बीत जाएगा सोचता हूँ,
मैं ख़ामोश हूँ तो चुप नहीं,
लड़ तो रहा हूँ पर ना जाने दिखता नहीं,
है मालूम मुझे की सुबह होगी तो सही,
की जनता नहीं अभी या फिर कभी……