आशियाँ

कुछ खोके भी शायद कुछ पाया मैंने,
कुछ पा के शायद कुछ खोया भी,
अँधेरे में गुज़र रही थी ये हस्ती मेरी,
आपको देखा तो पाई रोशनी भी,
कहते हैं मुलाज़िम नहीं इश्क़ किसी का,
कई रियासतें हैं उजाड़ी इसी ने भी,
बस अब और गिला क्या होगा,
जब मिल चुका है इस नाचीज़ को आशियाँ तुझमें भी…..

आख़िर कैसा है प्यार …?

वो प्यार प्यार नहीं,
तोड़ के जिसने ही,
झँझोर के भी,
आसमान में उड़ा के,
पटका ना हो ज़मीन पे कभी,

सुकून भी उतना ही हो उसमें,
जितनी बेचैनी ही,
पत्थर को खुदा जो बना देता भी है,
गुमशुदा कर देता वोही,

सौ उम्र भी जो दिखाता है,
हर रोज़ फ़ना करता वोही,
जान ले लेता है,
कर देता है अमर भी वोही,

हर किसी के नसीब में कहाँ,
लिखा है इश्क़ ऐसा कोई,
तुम-मैं तो ज़रिया हैं,
मुकम्मल इश्क़ किसी का,
शायद होगा इश्क़ ऐसा भी कोई…..

बेचैनी….

कुछ अलग सी बेचैनी है,
मैं पूछता भी हूँ इससे,
पर ये बोलती नहीं,
ना जाने क्यूँ रूठी है,
क्यूँ बात नहीं करती,

कुछ अलग सी बेचैनी है,
सर झुका के बैठी है कहीं,
सिसक-सिसक के रात इसने काटी,
सुबह थक के सो जाती है,
पता नहीं कल रात इसने खाना खाया की नहीं,

ना जाने किसके ख़याल में खोई है,
किसका इंतेज़ार इसे है,
सुलग-सुलग के इसने ज़माने काटे हैं,
फ़िर सुबह सूरज देख के ना जाने क्या सोचती है,

कुछ अलग सी बेचैनी है,
शायद मेरी नहीं,
शायद तुम्हारी नहीं,
पता नहीं फ़िर किसकी है,
कुछ अलग सी बेचैनी है……

गवारा नहीं….

क्या हुआ जो मुकम्मल ना हो सका वो इश्क़ मेरा,
पुरा था पर शायद ज़रूरी नहीं,
देख के चाँद रोज़ सजदा कर लेता हूँ,
क़ाबिल था पर शायद गवारा नहीं……

इश्क़

इश्क़ है किसी का दरिया,
बहता ही चला है,
है किसी का आशियाँ भी,
घर में रहता है,
किसी को खुदा दिखता भी उसी में है,
और किसी को ये जहाँ भी,
जुदा करके मिलाता भी है,
ना दिखा जो दिखा है,
ना जान के भी जो गवाह है,
है तुझमें भी,
मुझमें भी छुपा है कहीं,
दिखता मुझे भी किसी में है,
शायद तुझे भी किसी में,
है हाथ थाम लेता,
कभी झटक के छोढ़ जाता भी है,
पर इश्क़ नहीं जाता साया छोढ़ के किसी का,
वक्त वक्त की बात है साहब,
आज तू इश्क़ से है,
कल इश्क़ होगा तुझसे ही…..

राज़ गेहरा….

हर उम्र में छुपा है,
कोई राज़ गेहरा,
शब्दों से कोई,
तो करता है इशारों से बेपरदा,
में निकलता हूँ बाज़ारों से जब भी,
कुछ गुनगुना सी देतीं हैं,
आवाज़ें अनसुनी,
कोई चर्चा,
कोई क़िस्सा,
समेट के रख लेता हूँ उन आवाज़ों को झोले में अपने,
ना जाने किस उम्र में शब्दों का लिबास ओढ़ कर,
ये आ जाएँ ज़ुबान पे मेरी,
या फ़िर ग़ुम हो जाएँ इन सिलवटों पे मेरी,
क्या नहीं छुपा मुझमें भी कोई राज़ गेहरा….?

मेरा आसमान….

कुछ दबी दबी सी साँसों में,
खोया है मेरा आसमान,
मधम सी धूप है,
गीली है धरती भी,
इसपे ना जने किस किस के निशान,
मैं कोशिश भी करता हूँ कभी,
कभी सो जाता हूँ थक के,
क्या माँगता है,
तू ही बता दे ऐ खुदा,
धुन्दली सी हो जाती है,
नज़रें ये मेरी भी,
में पलके उठाता भी हूँ,
पर शायद सुबह नहीं हुयी अभी तक,
सो रहा कहीं अपनी ज़ुल्फ़ों को समेटे,
शायद मेरा भी आसमान,
ना जाने क्या क्या सितम झेले होंगे,
जब आया होगा घर लौट के वापिस,
माँ, बाबूजी, भाई, बहन,
क्या दिलासा देता है तेरा भी यह जहां,
पर शायद अब रात है,
या दिन भी,
अब होश धूमिल सा हो रहा,
कुछ दबी दबी सी साँसों में,
खोया है मेरा आसमान…..

शायर

बड़ी मुद्दतों के बाद निकला है आज,
छुपा बैठा था सीने में कहीं,
एक राज़ जो ज़ाहिर-ए-जहाँ है,
सुलग सुलग के इसने ना जाने कितनी हस्तियाँ निस्टेनाबूत की होंगी,
और एक मैं हूँ जो शायर बन बैठा……

नशा

कुछ अलग नशा सा है आँखों में उसकी,

मैं दूर जाता तो हूँ पर भी नही,

कोशिश कई बार की थी,

शब्दों में उतारूँ सीरत उसकी,

रात हुई,

हुई भोर भी अभी,

पर शायद क़ायम है बेपनाह उसका,

नशा इस मुलाज़िम पर आज अभी…..

रोशनी

रोशनी का भी क्या कोई मुक़ाम होगा,

ना जाने क्यूँ फिर ये रोशन कर जाती है कई सर्द रातें,

बेजान में फूँक जाती है ये बेबाक़ जान,

इल्म ही नहीं इसे शायद,

क्या मुकम्मल इसकी बाज़ुएँ हैं,

ये है तो सब है,

ये नहीं तो क्या है…..

नियत

ना जाने ख़ुदा से क्या रंजिश हुयी,
किस वक़्त, क्या समा हुयी,
जिस ख़ुदा को पाक मान लड़ी थी हीर राँझे के लिए,
उसी खुदा से मेरी यह नियत आज ख़फ़ा हुयी…….

बारिश की बूँदें गिरती हैं ऐसे,
कुछ बोझ सा हल्का कर दिया हो बादलों ने जैसे,
सच्ची मोहब्बत का इकरार,
हो या फिर एक दबी हुई आस,
कुछ ऐसे ही बरसते हैं गरजते हुए बादल,
धरती तो फिर महान है,
जो बर्दाश्त कर जाती है,
पर सेह नहीं पाते वो पुराने दरख्त,
अकस्मात सी बारिश या गड़गड़ाहट,
गिरा जाती है उन्हें,
टूट जाते हैं वो कच्चे धागे,
वो कसमें, वो वादे, वो इज़्ज़त, वो प्यार,
वापिस कहाँ आते हैं वो……

पुराने पिटारे……

कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
धूल जिन पर बना चुकी थी अपने मकान,
परिंदों सी बनके उड़ी वो बंद हसरतें,
वो यादें, वो कीमती लम्हे,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
वो गर्मी की दोपहरें,
धूप मैं दौड़ते,
वो चोर और सिपाही,
गलियों मैं आवाज़ लगाती,
वो मीठे बुढ़िया के बाल,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
कुछ पिटारों में थे,
वो गुड़िया-गुड्डे,
वो लाल गाड़ी,
वो लंबी रेलगाड़ी,
जिस पर कई बार बैठ,
किया करते थे सफर,
जिसकी सड़कें थी,
कभी दीवारें,
तो कभी थी पापाजी का वो विशाल सीना,
मिला वो पुराना झुनझुना भी उधर ही कहीं,
याद नहीं कब देखा था इसे कहीं,
संभाल के रखी थी एक कोने में,
वो स्कूल की ड्रेस,
कई बार जिसे ज़बर्दस्ती पेहेन,
निकल पड़ते थे स्कूल की ओर,
समय जिसे शायद अभी तक नहीं छू पाया था,
कुछ जादुई था यह पिटारा,
मैं कुछ देर वहीं बैठ गया था,
एक झंझानहट सी दोढ़ गयी थी पूरे जिस्‍म में,
वक़्त शायद गुस्ताख है,
गुज़रता मेरी या तेरी मर्ज़ी से नहीं,
जताता नहीं अपनी मौज़ूदगी,
फिर ऐसे ही किसी दिन,
खामोशी से दस्तक देता है,
मग्न कर देता है कई बार,
रुला भी देता है,
और एक हल्की सी चिंगारी जला जाता है,
उस सीने में मेरे और तुम्हारे,
सेक जिसकी शायद ज़रूरी है,
उस पुरानी रेलगाड़ी की छुक-छुक सुनने के लिए,
और शायद गर्म करने को वो ठंडे पड़े बुढ़िया के बाल,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने आज……

कभी आना….

कभी रोशनी बन कर आना तुम,

अंधेरे तो ज़िन्दगी ने बहुत दिए,

आसमान बन कर आना तुम,

दिलासे तो ज़िन्दगी ने बहुत दिए…….

Pieces of mine….. टुकड़े मेरे…….

कई दर्द छुपा रखे हैं मैंने,
यह जो सिलवटें हैं इस जिस्म पर मेरे,
ज़रा आना कभी फुर्सत से मेरी चौखट पर तुम भी किसी रोज़,
कुछ दफनाने हैं जो बच गए थे वो टुकड़े मेरे……..

No one sees the pain within,
The ones that stay in spaces of me,
Come to me, maybe once in a while,
Some pieces of mine are still left to be buried………

क्या हो सकता है यह?

मैं बढ़ता हूँ तेरी ओर,
धीरे धीरे फासले यह कम होते हैं,
धड़कता हुया यह दिल मेरा है,
कुछ शर्मा कर तुमसे केहना चाहता है,
हाथ तुम्हारा थाम कर दरिया यह पार करना चाहता है,
और जाना चाहता है उस जहाँ,
आसमान मिलता है इस धरती से जहां,
हो जाते हैं एक दोनों,
किसी जुगनू की तरह,
जो मिल चुका हो अपने मुकाम से,
आहिस्ता आहिस्ता, मद्धम मद्धम……..

ख्वाहिश…. 


ख्वाहिशों का बंद डिब्बा लिए,
रोज़ निकलता हूँ अपने घर से,
कोशिशें होती हैं की,
कोई आज़ाद हो सके ख्वाहिश मेरी,
सिक्कों की खनक मैं कोई मुस्कान सी आ जाती है,
आज खुलेगा डिब्बा मेरा,
फुर करके उड़ जाएगी आज कोई ख्वाहिश मेरी… 

आशियाना…. 

कभी आईना देखा,
तो कभी झाँका गेहराइयों मैं,
आसमानों की मुलायम पर्दों मैं देखा,
तो कभी समुन्दर के अनंत मैं,
घर ढूंढ रहा था मैं,
ना जाने कहाँ,
ना जाने कब,
अक्स जो तेरा गिरा था मुझ पर,
वो सर्द किसी रात मैं,
ना जाने कैसे,
ना जाने कब,
इस काफिर को अपना आशियाना मिल गया……