Fall

Cant help falling for you,

And as I begin to gasp,

Of air, of life, of something else,

A look of you shows me wonders,

You will be the end of me,

And I maybe a new beginning…….

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Baby

I can’t see with eyes wide open,

Baby hold me tight I am broken,

I fall if I try to walk,

Bruises all over my body,

Scars over my shadow,

I cannot hear,

Call my name,

Tell me it’s okay,

Be my eyes,

My ears,

Be my everything,

And nothing at all,

Come home baby,

I can’t see with eyes wide open……

नूर….

बारिश में भी आज कुछ नमी सी है,

ऐ दिल तुझमें कुछ आज कमी सी है,

रुक सी गयी है क्यूँ ये हवाएँ,

बेजान सी जाने क्यूँ लग रहीं हर दिशाएँ,

ना जाने क्यूँ आज छुप गया है सूरज भी बादलों में,

क्यूँ शर्मा के इसने मोड़ ली निगाहें,

सागर भी ले रहा है आज अंगड़ाइयां,

लहरे इसकी कर रही गुस्ताखियाँ,

फिर देखता हूँ जब वो नूर तेरा,

शब्द ढूँढता है यह ज़मीर मेरा,

बेज़ुबान हो जाती यह हस्ती मेरी,

और खिल जाता यह जहाँ तेरा,

हर ज़र्रा तब पुकारता है मज़हब तेरा,

अल्लाह हू,

हू अल्लाह…..

Night

As the night slowly descends,

The ghosts of the past,

The mistakes, the lost and the smothered,

The boy scared to his deepest bones,

Prepares himself for them,

Those that have chased him for eternity,

Hopelessness, despair and plight,

Everynight they come,

Sometimes shrivels him in his sleep,

Sometimes drop him to the trenches deep,

The boy scared and lonely,

Closes his eyes and tell himself each day,

This all would be worth someday,

For the night is not eternal,

For the plight is not eternal…..

लकड़ी

कुछ खुरदरी सी लहरें हैं ये,
कुछ लड़ती हुयी इनसे कश्ती ये,
साहिल की ख़्वाहिश लिए,
कभी साथी थी इसकी हवाएँ ख़ुशगवार,
कभी धोखे से जिन्होंने चाहा डुबाना,
एक झलक में रंग बदलते नाक़िस बादल,
ना जाने क्या था उस कश्ती में,
कुछ ने कहा इसकी लकड़ी है बेबाक़,
या शायद इसका कारीगर था कलाकार,
तभी तो यह कश्ती है आज तक बुलंद,
कश्ती सुन रही थी सब कुछ,
चुप थी,
शायद उसे भी पता था,
वो नहीं है लकड़ी या कारीगर जिसकी बदौलत वो है,
अंदर या बाहर,
यहाँ, वहाँ, सारा जहाँ,
फ़ौलाद लहू बनकर जब बहता है,
निसार करके ख़ुद को जब,
साहिल की ओर बढ़ते हैं क़दम,
क्या मजाल है किसी मक्कार फ़िज़ा की,
या समंदर आबाद,
डूबा दे हस्ती को मेरी,
लकड़ी तो फिर मिट जाती है मिट्टी में,
यह फ़ौलाद ही है जो सदियों मेरा हफ़ज़ा होगा..

नियत

ना जाने ख़ुदा से क्या रंजिश हुयी,
किस वक़्त, क्या समा हुयी,
जिस ख़ुदा को पाक मान लड़ी थी हीर राँझे के लिए,
उसी खुदा से मेरी यह नियत आज ख़फ़ा हुयी…….

पुराने पिटारे……

कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
धूल जिन पर बना चुकी थी अपने मकान,
परिंदों सी बनके उड़ी वो बंद हसरतें,
वो यादें, वो कीमती लम्हे,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
वो गर्मी की दोपहरें,
धूप मैं दौड़ते,
वो चोर और सिपाही,
गलियों मैं आवाज़ लगाती,
वो मीठे बुढ़िया के बाल,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
कुछ पिटारों में थे,
वो गुड़िया-गुड्डे,
वो लाल गाड़ी,
वो लंबी रेलगाड़ी,
जिस पर कई बार बैठ,
किया करते थे सफर,
जिसकी सड़कें थी,
कभी दीवारें,
तो कभी थी पापाजी का वो विशाल सीना,
मिला वो पुराना झुनझुना भी उधर ही कहीं,
याद नहीं कब देखा था इसे कहीं,
संभाल के रखी थी एक कोने में,
वो स्कूल की ड्रेस,
कई बार जिसे ज़बर्दस्ती पेहेन,
निकल पड़ते थे स्कूल की ओर,
समय जिसे शायद अभी तक नहीं छू पाया था,
कुछ जादुई था यह पिटारा,
मैं कुछ देर वहीं बैठ गया था,
एक झंझानहट सी दोढ़ गयी थी पूरे जिस्‍म में,
वक़्त शायद गुस्ताख है,
गुज़रता मेरी या तेरी मर्ज़ी से नहीं,
जताता नहीं अपनी मौज़ूदगी,
फिर ऐसे ही किसी दिन,
खामोशी से दस्तक देता है,
मग्न कर देता है कई बार,
रुला भी देता है,
और एक हल्की सी चिंगारी जला जाता है,
उस सीने में मेरे और तुम्हारे,
सेक जिसकी शायद ज़रूरी है,
उस पुरानी रेलगाड़ी की छुक-छुक सुनने के लिए,
और शायद गर्म करने को वो ठंडे पड़े बुढ़िया के बाल,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने आज……

Yesterday I Saw Her…….

Yesterday I saw her, 
Drenched in the morning drizzle, 
Yesterday I saw her, 
She was thinking, 
Not looking,
Just walking, 
Yesterday I saw her, 
As the tarmac stick to her shoes, 
The shirt that was a bit loose, 
Yesterday I saw her, 
And she walked as the skies turned greyer, 
The clouds growled louder and laid their chest open bare, 
Yesterday I saw her, 
She needed no one, 
Or maybe it was the with her, 
She sailed through the freefall, 
Of the thousand microneers, 
Yesterday I saw her, 
And saw her near, 
The winds had guided our little vessel, 
Onto the lands of the sun, 
The moon and beyond, 
Yesterday I saw her, 
As she walked away, 
Slowly diminishing in the growling rain, 
I sailed a boat in her direction, 
Hoped that it might reach her, 
Boats of paper seldom reach, 
The oceans wide and blue, 
But who could take that from me, 
Yesterday I saw her…….