आसमान

दिखते हैं किसी को आसमान में परिंदे,
हसरतों से भरे,
उजाले से सजे,
होता है किसी का आसमान गहराइयों सा भी,
अनंत, शून्य, अनदेखा,
पर शायद होगा इन्ही आँखों का क़सूर,
समझ के जो ऐसी मुख़बरि की होगी,
तेरा, मेरा, है क्या सबका एक जैसा आसमान….?

शायर

बड़ी मुद्दतों के बाद निकला है आज,
छुपा बैठा था सीने में कहीं,
एक राज़ जो ज़ाहिर-ए-जहाँ है,
सुलग सुलग के इसने ना जाने कितनी हस्तियाँ निस्टेनाबूत की होंगी,
और एक मैं हूँ जो शायर बन बैठा……

नशा

कुछ अलग नशा सा है आँखों में उसकी,

मैं दूर जाता तो हूँ पर भी नही,

कोशिश कई बार की थी,

शब्दों में उतारूँ सीरत उसकी,

रात हुई,

हुई भोर भी अभी,

पर शायद क़ायम है बेपनाह उसका,

नशा इस मुलाज़िम पर आज अभी…..

नियत

ना जाने ख़ुदा से क्या रंजिश हुयी,
किस वक़्त, क्या समा हुयी,
जिस ख़ुदा को पाक मान लड़ी थी हीर राँझे के लिए,
उसी खुदा से मेरी यह नियत आज ख़फ़ा हुयी…….