Touch…

I crave for the sensation,
The blood that oozes out of my December skin,
Dry, thick, viscous,
That covers up my pores,
For it carries deep within itself,
Affairs of our bodies and mind,
The days when nothing could separate us,
Long, moist, infinite nights of passion,
We carved a piece of ourselves,
On the annals of time,
Volcanic eruptions, the calm before the storm,
I crave for your body,
The oxytocin that flooded my mind,
And the heart that pumped blood,
Everywhere except my breath,
That fell short whenever we kissed,
For you breathed for me,
And I collected stars for you,
I crave and crave so much more,
The dripping sweet and sonorous,
Your touch,
My end and beginning…..

जाम….

मत पूछो ये हाल मेरा,
है थामा ऐसा जाम मैंने,
की सच बोल गया तो,
उतर जाएँगे ये चेहरे सुनहरे,
आज चुप हूँ तो शायद देख रहे हो तुम भी,
कल जो बोल पड़ा इस मेहफ़िल में तुम्हारी,
फिर कहाँ छुपाओगे वो दाग गहरे…..

Do not ask for how I am,
My glass holds a wine dear,
This mouth if calls a name true,
Shine will shy away from faces white,
You look at me for I am mum,
My lips if will spill the secrets in your gala spectacular,
Scars will follow till the memories testify….

Void

When silences speak for the void in between,
Sound loses its worth,
Presence, absence, today or tomorrow,
Incompetent they become…..

ख़ामोशी जब बयान करती है शून्य को कभी,
आवाज़ खो देती है अपना आयाम,
होना, ना होना, आज, कल,
अक्षम हो जाते हैं सब……

गवारा नहीं….

क्या हुआ जो मुकम्मल ना हो सका वो इश्क़ मेरा,
पुरा था पर शायद ज़रूरी नहीं,
देख के चाँद रोज़ सजदा कर लेता हूँ,
क़ाबिल था पर शायद गवारा नहीं……

आसमान

दिखते हैं किसी को आसमान में परिंदे,
हसरतों से भरे,
उजाले से सजे,
होता है किसी का आसमान गहराइयों सा भी,
अनंत, शून्य, अनदेखा,
पर शायद होगा इन्ही आँखों का क़सूर,
समझ के जो ऐसी मुख़बरि की होगी,
तेरा, मेरा, है क्या सबका एक जैसा आसमान….?

शायर

बड़ी मुद्दतों के बाद निकला है आज,
छुपा बैठा था सीने में कहीं,
एक राज़ जो ज़ाहिर-ए-जहाँ है,
सुलग सुलग के इसने ना जाने कितनी हस्तियाँ निस्टेनाबूत की होंगी,
और एक मैं हूँ जो शायर बन बैठा……

नशा

कुछ अलग नशा सा है आँखों में उसकी,

मैं दूर जाता तो हूँ पर भी नही,

कोशिश कई बार की थी,

शब्दों में उतारूँ सीरत उसकी,

रात हुई,

हुई भोर भी अभी,

पर शायद क़ायम है बेपनाह उसका,

नशा इस मुलाज़िम पर आज अभी…..

नियत

ना जाने ख़ुदा से क्या रंजिश हुयी,
किस वक़्त, क्या समा हुयी,
जिस ख़ुदा को पाक मान लड़ी थी हीर राँझे के लिए,
उसी खुदा से मेरी यह नियत आज ख़फ़ा हुयी…….