ख़ामोशी….

कुछ ख़ामोश में था,

कुछ बेरुख़ी शायद उन्हें थी,

बारिशें हो तो रही थीं,

पर कुछ नमी कम थी,

कुछ ख़ामोश में था,

कुछ बेरुख़ी शायद उन्हें थी…..

नूर….

बारिश में भी आज कुछ नमी सी है,

ऐ दिल तुझमें कुछ आज कमी सी है,

रुक सी गयी है क्यूँ ये हवाएँ,

बेजान सी जाने क्यूँ लग रहीं हर दिशाएँ,

ना जाने क्यूँ आज छुप गया है सूरज भी बादलों में,

क्यूँ शर्मा के इसने मोड़ ली निगाहें,

सागर भी ले रहा है आज अंगड़ाइयां,

लहरे इसकी कर रही गुस्ताखियाँ,

फिर देखता हूँ जब वो नूर तेरा,

शब्द ढूँढता है यह ज़मीर मेरा,

बेज़ुबान हो जाती यह हस्ती मेरी,

और खिल जाता यह जहाँ तेरा,

हर ज़र्रा तब पुकारता है मज़हब तेरा,

अल्लाह हू,

हू अल्लाह…..

लकड़ी

कुछ खुरदरी सी लहरें हैं ये,
कुछ लड़ती हुयी इनसे कश्ती ये,
साहिल की ख़्वाहिश लिए,
कभी साथी थी इसकी हवाएँ ख़ुशगवार,
कभी धोखे से जिन्होंने चाहा डुबाना,
एक झलक में रंग बदलते नाक़िस बादल,
ना जाने क्या था उस कश्ती में,
कुछ ने कहा इसकी लकड़ी है बेबाक़,
या शायद इसका कारीगर था कलाकार,
तभी तो यह कश्ती है आज तक बुलंद,
कश्ती सुन रही थी सब कुछ,
चुप थी,
शायद उसे भी पता था,
वो नहीं है लकड़ी या कारीगर जिसकी बदौलत वो है,
अंदर या बाहर,
यहाँ, वहाँ, सारा जहाँ,
फ़ौलाद लहू बनकर जब बहता है,
निसार करके ख़ुद को जब,
साहिल की ओर बढ़ते हैं क़दम,
क्या मजाल है किसी मक्कार फ़िज़ा की,
या समंदर आबाद,
डूबा दे हस्ती को मेरी,
लकड़ी तो फिर मिट जाती है मिट्टी में,
यह फ़ौलाद ही है जो सदियों मेरा हफ़ज़ा होगा..

नियत

ना जाने ख़ुदा से क्या रंजिश हुयी,
किस वक़्त, क्या समा हुयी,
जिस ख़ुदा को पाक मान लड़ी थी हीर राँझे के लिए,
उसी खुदा से मेरी यह नियत आज ख़फ़ा हुयी…….

पैमाना

कुछ इस क़दर गये थे तुम,

आज भी उन सिलवटों को काग़ज़ पर उतारने कि कोशिश कर रहा हूँ,

ना जाने कैसा ख़ुमार था कशिश में तुम्हारी,

मैं आज भी अपना पैमाना ढूंढ रहा हूँ…….

कभी आना….

कभी रोशनी बन कर आना तुम,

अंधेरे तो ज़िन्दगी ने बहुत दिए,

आसमान बन कर आना तुम,

दिलासे तो ज़िन्दगी ने बहुत दिए…….

ख्वाहिश…. 


ख्वाहिशों का बंद डिब्बा लिए,
रोज़ निकलता हूँ अपने घर से,
कोशिशें होती हैं की,
कोई आज़ाद हो सके ख्वाहिश मेरी,
सिक्कों की खनक मैं कोई मुस्कान सी आ जाती है,
आज खुलेगा डिब्बा मेरा,
फुर करके उड़ जाएगी आज कोई ख्वाहिश मेरी… 

आशियाना…. 

कभी आईना देखा,
तो कभी झाँका गेहराइयों मैं,
आसमानों की मुलायम पर्दों मैं देखा,
तो कभी समुन्दर के अनंत मैं,
घर ढूंढ रहा था मैं,
ना जाने कहाँ,
ना जाने कब,
अक्स जो तेरा गिरा था मुझ पर,
वो सर्द किसी रात मैं,
ना जाने कैसे,
ना जाने कब,
इस काफिर को अपना आशियाना मिल गया……

The night had lost its senses…..

शाम भी हसीन थी, 
कुछ गहरी कुछ बेबाक थी, 
वो आए थे किसी हवा के झोंके की तरह, 
जाम हमने क्या था पकड़ा, 
शाम शराबी हो गयी….. 


The evening was magnificent, 
A little reserve, a little extravagant, 
She came as a gush of wind, 
I held a glass in my hands, 
And the night had lost its senses….