बारिश की बूँदें गिरती हैं ऐसे,
कुछ बोझ सा हल्का कर दिया हो बादलों ने जैसे,
सच्ची मोहब्बत का इकरार,
हो या फिर एक दबी हुई आस,
कुछ ऐसे ही बरसते हैं गरजते हुए बादल,
धरती तो फिर महान है,
जो बर्दाश्त कर जाती है,
पर सेह नहीं पाते वो पुराने दरख्त,
अकस्मात सी बारिश या गड़गड़ाहट,
गिरा जाती है उन्हें,
टूट जाते हैं वो कच्चे धागे,
वो कसमें, वो वादे, वो इज़्ज़त, वो प्यार,
वापिस कहाँ आते हैं वो……

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