नूर….

बारिश में भी आज कुछ नमी सी है,

ऐ दिल तुझमें कुछ आज कमी सी है,

रुक सी गयी है क्यूँ ये हवाएँ,

बेजान सी जाने क्यूँ लग रहीं हर दिशाएँ,

ना जाने क्यूँ आज छुप गया है सूरज भी बादलों में,

क्यूँ शर्मा के इसने मोड़ ली निगाहें,

सागर भी ले रहा है आज अंगड़ाइयां,

लहरे इसकी कर रही गुस्ताखियाँ,

फिर देखता हूँ जब वो नूर तेरा,

शब्द ढूँढता है यह ज़मीर मेरा,

बेज़ुबान हो जाती यह हस्ती मेरी,

और खिल जाता यह जहाँ तेरा,

हर ज़र्रा तब पुकारता है मज़हब तेरा,

अल्लाह हू,

हू अल्लाह…..

The Shine in His Eyes

The winds had murmured in his ears one day,

She’s the one grab her today,

The shy him quickly grew a pair of socks,

And ventured to the unknown lands,

The lands he had always avoided,

The lands he had always feared,

She came like the morning sunshine,

The lands glistened with her shine,

The soil beneath his feet shook,

Run you stupid lad,

Run before she dims away,

And as the boy with all his might,

Ventured into the deepest night,

Followed the path that led to her,

In a hope to be hers forever,

He saw the paparazzi that had followed her as well,

The crowd, the people and their shiny veil,

Maybe she has all that she needs,

The love, the care and all that glare,

What I am is a simple being,

Who has no shoes, no dreams to see,

And as he moved back towards his abode,

Something had caught his hand,

He looked back to see who it was,

There she was standing,

Not the one that had lit the sky,

But had brought a shine in his eyes……

Morning

The Earth had slowly moved,

Days somewhere,

Nights elsewhere,

Commotion someplace,

Serenity everywhere else,

Sunlight slowly grazed upon the motionless earth,

Moonlight over the back,

The golden light had fell over her heavenly eyes,

Just like a spotlight over a dark stage,

She glowed like the brightest star,

The ones that could shine through galaxies and time and space,

She opened her eyes,

Good Morning I had said,

A smile had just adorned her face,

Like the ones they write about in novels great,

The ones that are satisfying in their very own ways,

Those that give you the reason to believe that you have everything in the world,

And why wouldn’t it,

She is the star my universe had ever needed,

My end and my beginning……

लकड़ी

कुछ खुरदरी सी लहरें हैं ये,
कुछ लड़ती हुयी इनसे कश्ती ये,
साहिल की ख़्वाहिश लिए,
कभी साथी थी इसकी हवाएँ ख़ुशगवार,
कभी धोखे से जिन्होंने चाहा डुबाना,
एक झलक में रंग बदलते नाक़िस बादल,
ना जाने क्या था उस कश्ती में,
कुछ ने कहा इसकी लकड़ी है बेबाक़,
या शायद इसका कारीगर था कलाकार,
तभी तो यह कश्ती है आज तक बुलंद,
कश्ती सुन रही थी सब कुछ,
चुप थी,
शायद उसे भी पता था,
वो नहीं है लकड़ी या कारीगर जिसकी बदौलत वो है,
अंदर या बाहर,
यहाँ, वहाँ, सारा जहाँ,
फ़ौलाद लहू बनकर जब बहता है,
निसार करके ख़ुद को जब,
साहिल की ओर बढ़ते हैं क़दम,
क्या मजाल है किसी मक्कार फ़िज़ा की,
या समंदर आबाद,
डूबा दे हस्ती को मेरी,
लकड़ी तो फिर मिट जाती है मिट्टी में,
यह फ़ौलाद ही है जो सदियों मेरा हफ़ज़ा होगा..

बारिश की बूँदें गिरती हैं ऐसे,
कुछ बोझ सा हल्का कर दिया हो बादलों ने जैसे,
सच्ची मोहब्बत का इकरार,
हो या फिर एक दबी हुई आस,
कुछ ऐसे ही बरसते हैं गरजते हुए बादल,
धरती तो फिर महान है,
जो बर्दाश्त कर जाती है,
पर सेह नहीं पाते वो पुराने दरख्त,
अकस्मात सी बारिश या गड़गड़ाहट,
गिरा जाती है उन्हें,
टूट जाते हैं वो कच्चे धागे,
वो कसमें, वो वादे, वो इज़्ज़त, वो प्यार,
वापिस कहाँ आते हैं वो……

पुराने पिटारे……

कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
धूल जिन पर बना चुकी थी अपने मकान,
परिंदों सी बनके उड़ी वो बंद हसरतें,
वो यादें, वो कीमती लम्हे,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
वो गर्मी की दोपहरें,
धूप मैं दौड़ते,
वो चोर और सिपाही,
गलियों मैं आवाज़ लगाती,
वो मीठे बुढ़िया के बाल,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने,
कुछ पिटारों में थे,
वो गुड़िया-गुड्डे,
वो लाल गाड़ी,
वो लंबी रेलगाड़ी,
जिस पर कई बार बैठ,
किया करते थे सफर,
जिसकी सड़कें थी,
कभी दीवारें,
तो कभी थी पापाजी का वो विशाल सीना,
मिला वो पुराना झुनझुना भी उधर ही कहीं,
याद नहीं कब देखा था इसे कहीं,
संभाल के रखी थी एक कोने में,
वो स्कूल की ड्रेस,
कई बार जिसे ज़बर्दस्ती पेहेन,
निकल पड़ते थे स्कूल की ओर,
समय जिसे शायद अभी तक नहीं छू पाया था,
कुछ जादुई था यह पिटारा,
मैं कुछ देर वहीं बैठ गया था,
एक झंझानहट सी दोढ़ गयी थी पूरे जिस्‍म में,
वक़्त शायद गुस्ताख है,
गुज़रता मेरी या तेरी मर्ज़ी से नहीं,
जताता नहीं अपनी मौज़ूदगी,
फिर ऐसे ही किसी दिन,
खामोशी से दस्तक देता है,
मग्न कर देता है कई बार,
रुला भी देता है,
और एक हल्की सी चिंगारी जला जाता है,
उस सीने में मेरे और तुम्हारे,
सेक जिसकी शायद ज़रूरी है,
उस पुरानी रेलगाड़ी की छुक-छुक सुनने के लिए,
और शायद गर्म करने को वो ठंडे पड़े बुढ़िया के बाल,
कुछ खोले हैं पुराने पिटारे मैंने आज……

You Fall…..

I moved slowly ahead,
The pulsating heart,
Now enjoying the sudden commotion,
I am still behind he shouted,
As I forced my legs to move,
I came a distance,
Only to look behind,
He had gotten rid of the hold,
I fell down,
But that day I had learnt,
Something that would last forever,
Simple it was and sound it is today,
You pedal to move,
And stop to fall,
But then,
You only fall down to pick yourselves up….

 

Yesterday I Saw Her…….

Yesterday I saw her, 
Drenched in the morning drizzle, 
Yesterday I saw her, 
She was thinking, 
Not looking,
Just walking, 
Yesterday I saw her, 
As the tarmac stick to her shoes, 
The shirt that was a bit loose, 
Yesterday I saw her, 
And she walked as the skies turned greyer, 
The clouds growled louder and laid their chest open bare, 
Yesterday I saw her, 
She needed no one, 
Or maybe it was the with her, 
She sailed through the freefall, 
Of the thousand microneers, 
Yesterday I saw her, 
And saw her near, 
The winds had guided our little vessel, 
Onto the lands of the sun, 
The moon and beyond, 
Yesterday I saw her, 
As she walked away, 
Slowly diminishing in the growling rain, 
I sailed a boat in her direction, 
Hoped that it might reach her, 
Boats of paper seldom reach, 
The oceans wide and blue, 
But who could take that from me, 
Yesterday I saw her…….