Eternity…..

And as they walked down the aisle,
Hand in hand,
The world watched them slowly descend,
Tears in some eyes, joy too,
Wrinkles had covered their faces,
Hands not that strong,
Who says love needs eternity to grow,
A firefly dies every single night,
Just to be the light……

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अल्ला….

कुछ फुर्सत से बनाई होगी यह निगाह मेरी तूने,
देखता भी मैं तुझे हूँ,
दिखता भी तू नहीं है,
फिर भी जब कहीं सजदा कर लेता हूँ किसी मज़ार पर तेरी,
हवाएं चुपके से केह जाती हैं इन कानो में मेरे,
अल्ला हू अल्ला हू अल्ला हू….

दर्द….

उस दर्द की क्या दवा ढूंढिये,
रह रह कर जो उभर ही आता है,
मर्ज होता नहीं कुछ बीमारियां ऐसी भी हैं जनाब,
कुछ वक़्त के साथ जाती हैं,
कुछ के लिए यह जाम ही काफी है…….

Where to find the cure of the pain,
Emerges that with time to time,
Diseases sometimes are incurable,
Those that go with time,
Or sometimes a glass of my favourite wine….

अक्स तेरा……

हम लबों से जो ना कह पाए,
हो सकती थी जो हसीन दास्ताँ,
ज़ुबान धोखा दे जाती है ना जाने क्यूँ,
धीमी बे‍हती नदी में जब कभी,
अक्स तेरा दिख जाता है जो…….

ज़िंदा ना गाड़ो…. 

ऐसे मेहफिल में तो ना गिराया करो ए दोस्‍त हमें,
माना आप जितने ना बन पाए हैं अभी,
थोड़ी किस्मत बेवफा थी,
और शायद वक़्त खराब था,
कोशिश कोन नहीं करता जनाब,
की सवर जाए उसका भी नसीब,
ठुकराए हुए दुनिया से जब आतें हैं हम कभी दर पर तेरे,
ऐसे ना छलनी किया करो हमें,
शायद कभी पहुंच पाएंगे जहां हैसियत है तेरी,
आज तो ज़िंदा गाड़ो ना हमें…..

पारियों की रानी…. 

कभी हस के भी मिला करो,
इतना भी  गुरूर ठीक नहीं,
सताया इतना करो,
जितना बर्दाश्त हो सके,
पत्थर की मूरत अक्सर टूट जाती है,
नेक हो जो इरादे ही सही,
मजबूर ना कीजिए हमें ए पारियों की रानी,
वरना फरिश्ते हम भी नहीं….

ख्वाहिश…. 


ख्वाहिशों का बंद डिब्बा लिए,
रोज़ निकलता हूँ अपने घर से,
कोशिशें होती हैं की,
कोई आज़ाद हो सके ख्वाहिश मेरी,
सिक्कों की खनक मैं कोई मुस्कान सी आ जाती है,
आज खुलेगा डिब्बा मेरा,
फुर करके उड़ जाएगी आज कोई ख्वाहिश मेरी… 

आशियाना…. 

कभी आईना देखा,
तो कभी झाँका गेहराइयों मैं,
आसमानों की मुलायम पर्दों मैं देखा,
तो कभी समुन्दर के अनंत मैं,
घर ढूंढ रहा था मैं,
ना जाने कहाँ,
ना जाने कब,
अक्स जो तेरा गिरा था मुझ पर,
वो सर्द किसी रात मैं,
ना जाने कैसे,
ना जाने कब,
इस काफिर को अपना आशियाना मिल गया……

Stranger as my own….. 

As he settled for everything that wasn’t his own,
All his dreams, desires and wishes,
Died a bitter death,
Choked, mutilated and starving,
Were they left,
While he told himself,
Maybe it’s for the best,
And made them his own,
The world assured,
Gave him the reasons,
And he caved in,
Until the day,
His heart couldn’t take no more,
It’s a risky choice,
They said,
As he left the stranger he had made his own,
And ventured into the night,
With nothing but hope,
Few family, maybe some friends,
And he took on the mighty Hill,
Not as an enemy,
But an ideal yet to achieve,
Maybe I fail,
Maybe I win,
Maybe I die trying,
He told the world,
As the world mocked his legs,
His figure, his brains,
But shall I sleep with dreams,
Of the things I saw,
The things I felt,
Onto the ride,
That felt my own…..